चाँदनी रात (Moon Light)

सब सो चुके थे और मैं जाग रही थी ।रात के समय में सब खामोश होता है और किस को पता कि कौन क्या कर रहा है । मुझे नींद नहीं आ रही थी तो मैंने  सोचा की छत पर धुम आऊ । आज चाँदनी रात थी और खामोशी का मजा कुछ और ही था । उस अंधरे में मुझे अलग सी खुशी महसूस हुई और मैं अपने में खुशी से नाच रही थी ।
कोई भी मुझे अंधरे में भुत समझता । पर वहाँ मेरे आलवा कोई  और मौजूद नहीं था ( ऐसा मुझे लगा था) ।
पर जैसे ही मैं पीछे पलटने लगी तो पड़ोस की छत से एक आदमी की परछाई मेरे ओर देख रही थी ।
मैं अंधरे में खड़ी थी इसलिए उसे यह दिखाई नहीं दिया होगा कि मैं कौन हूँ । अंधरे का फायदा उठाकर मैं वहां से भाग कर कमरे में वापस आ गयी ।
कल सुबह किसे याद रहे गा की अंधरे में कौन था।
वह यही कहेगा की उसने छत पर भूत/ चुड़ैल देखा ।


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